जुलाई 2015 में ईरान और गुट पांच धन एक के बीच जो परमाणु समझौता हुआ था उसे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सदैव बदतरीन समझौता कहा है।
वह जारी वर्ष की आठ मई को एक पक्षीय रूप से इस अंतरराष्ट्रीय समझौते से निकल गये और साथ ही ईरान के खिलाफ विलंबित प्रतिबंधों की अगस्त और नवंबर में दोबारा बहाली की घोषणा की।
ट्रंप के एकपक्षीय दृष्टिकोणों के खिलाफ यूरोपीय संघ अपने हितों के परिप्रेक्ष्य में ईरान के साथ होने वाले परमाणु समझौते को बाकी रखने पर बल देता है और इसी कारण ईरान और यूरोपीय संघ के बीच हालिया महीनों में कई बार वार्तायें भी हुई हैं।
ईरान ने अमेरिका को छोड़कर यूरोपीय देशों को इस बात का अवसर दिया है कि वह इस समझौते को बाकी रखने के लिए आवश्यक कदम उठायें।
यूरोपीय संघ भी ईरान के साथ होने वाले परमाणु समझौते को बाकी रखने के लिए प्रयासरत है। उसके इस प्रयास से अमेरिकी अधिकारी चिंतित हैं। यूरोपीय संघ में अमेरिकी राजदूत गोर्डन सन्डलैन्ड ने बुधवार को कहा कि परमाणु समझौते को बाकी रखने के लिए यूरोपीय संघ जो प्रयास कर रहा है उससे अमेरिका सहमत नहीं है।
साथ ही वाशिंग्टन का दावा है कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों की अनदेखी करके यूरोपीय संघ जो प्रयास कर रहा है वह प्रभावी नहीं होंगे क्योंकि अधिकांश कंपनियां इस संबंध में किये जाने वाले प्रयासों से सहकारिता नहीं करेंगी।
ट्रंप के अनुसार विदेशी कंपनियों को इस बात का चयन करना चाहिये कि वे ईरान के साथ या अमेरिका के साथ व्यापार करेंगी और वे एक साथ दोनों देशों के साथ व्यापार नहीं कर सकतीं।
इसके मुकाबले में यूरोपीय संघ के तीन महत्वपूर्ण देश जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस परमाणु समझौते को बाकी रखने के साथ- साथ अमेरिकी कार्यवाहियों से भी मुकाबले पर बल दे रहे हैं और इस संबंध में वे प्रयास भी कर रहे हैं।
यूरोपीय संघ की विदेश नीति आयुक्त फेड्रीका मोगरीनी ने इस संदर्भ में कहा है कि हमारा प्रयास इस संघ के सदस्य और विश्व के दूसरे देशों के साथ जारी है ताकि हम इस बात से आश्वस्त हो जायें कि ईरान और ईरानी नागरिक यूरोपीय संघ और विश्व के दूसरे देशों के साथ होने वाले व्यापारिक संबंधों से लाभांवित हो रहे हैं।
ईरान के साथ होने वाली वार्ता में यूरोपीय संघ वचनबद्ध हुआ है कि वह परमाणु समझौते को बाकी रखने और ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों से मुकाबले के लिए तेहरान को समर्थन पैकेज देगा।
बहरहाल यूरोपीय संघ का मानना है कि इस समझौते के खत्म हो जाने से अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा पर बहुत अधिक नकारात्मक प्रभाव पड़ेंगे और साथ ही यूरोपीय संघ के कूटनयिक प्रयास पर प्रश्न चिन्ह भी लग जायेगा।
इन सब बातों के दृष्टिगत और अमेरिका की मानसिक धमकियों की अनदेखी करते हुए यूरोपीय संघ ने ईरान के साथ होने वाले परमाणु समझौते को बाकी रखने पर बल दिया है।